Shailputri – शैलपुत्री

माँ शैलपुत्री का नवदुर्गा में पहला स्थान है । नवरात्री में पहले / प्रथम नवरात्री को माँ शैलपुत्री की ही पूजा / उपासना / आराधना होती है । माँ शैलपुत्री को यह नाम देने के पीछे भी कई विचार प्रचलित हैं। सर्वमान्य हिन्दू धर्म के प्राचीन ग्रंथों, पुराणों, उपनिषदों इत्यादि के अनुसार कहा जाता है की माँ दुर्गा ने जब पर्वतराज हिमालय के यहां पुत्री रूप में जन्म लिया था तो उनका नाम “शैलपुत्री” पड़ा। नवरात्र पूजन में प्रथम दिवस / दिन शैलपुत्री की पूजा उपासना की जाती है। नवरात्र उपासकों के लिए नवरात्र के नौ दिन शक्ति रूप माँ की साधना के दिन होते हैं। प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को मूलाधार चक्र में स्थित करते हैं और अपनी योग साधना का प्रारम्भ करते हैं।

“शैल” के कई अर्थ हैं जिनमे से एक अर्थ होता है “शिखर”। कहते हैं जब ऊर्जा अपने चरम पर होती है तब ही आप शुद्ध चेतना या देवी स्वरुप को पहचान सकते हैं क्योंकि इसकी उत्पत्ति शिखर से ही होती है। शिखर से उत्पत्ति होने के कारण भी माँ को शैलपुत्री कहा जाता है।

शैलपुत्री की पूजा रचना निम्न श्लोक / के द्वारा की जाती है ।

वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् | वृषारूढाम् शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ||

शैलपुत्री एक हिन्दू देवी हैं। इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल, और बाएं हाथ में कमल पुष्प रहता है। इनका वाहन गाय अथवा वृषभ माना जाता है। नवदुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री की शक्तियां अनंत हैं और इनका स्थान नवदुर्गा में बहुत महत्वपूर्ण हैं। शैलपुत्री का विवाह उनके पूर्वजन्म (सती अवतार) की भाँती भगवान् शिव से ही हुआ माना जाता है।

शास्‍त्रों के अनुसार माता शैलपुत्री का स्वरुप अति दिव्य है। मां के दाहिने हाथ में त्रिशूल है जो भगवान शिव द्वारा दिया गया है, जबकि मां के बाएं हाथ में भगवान विष्‍णु द्वारा प्रदत्‍त कमल का फूल शोभा देता है। मां शैलपुत्री नंदी बैल पर सवारी करती हैं और इन्‍हें समस्त वन्य जीव-जंतुओं का रक्षक माना जाता है।

नवरात्रि के दौरान प्रथम दिन मां दुर्गा के शैलपुत्री वाले स्वरुप की उपासना (स्तुति / आराधना / पूजा) करने से आकस्मिक आपदाओं से मुक्ति मिलती है। इसीलिए प्राचीन काल से ही दुर्गम स्थानों पर बस्तियां बनाने से पहले मां शैलपुत्री की स्थापना की जाती है माना जाता है कि इनकी स्थापना से वह स्थान सुरक्षित हो जाता है और मां की प्रतिमा स्थापित होने के बाद उस स्थान पर आपदा, रोग, व्‍याधि, संक्रमण का खतरा नहीं होता तथा जीव निश्चिंत होकर उस स्‍थान पर अपना जीवन व्यतीत कर सकते हैं। और माँ  सदैव ही उनकी सभी प्रकार की आपदाओं एवं व्याधियों से संरक्षा करती हैं। माँ शैलपुत्री को अखंड सौभाग्य की देवी भी माना जाता है। कहते हैं इनकी आराधना से स्त्रियों को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

 

नवरात्रों में माँ शैलपुत्री के पूजन की विधि

सबसे पहले चौकी पर माता शैलपुत्री की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद गंगा जल या गोमूत्र से शुद्धिकरण करें। चौकी पर चांदी, तांबे या मिट्टी के घड़े में जल भरकर उस पर नारियल रखकर कलश स्थापना करें। उसी चौकी पर श्रीगणेश, वरुण, नवग्रह, षोडश मातृका (16 देवी), सप्त घृत मातृका (सात सिंदूर की बिंदी लगाएं) की स्थापना भी करें। इसके बाद व्रत, पूजन का संकल्प लें और वैदिक एवं सप्तशती मंत्रों द्वारा मां शैलपुत्री सहित समस्त स्थापित देवताओं की षोडशोपचार पूजा करें। इसमें आवाहन, आसन, पाद्य, अध्र्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दुर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, पुष्प-हार, सुगंधित द्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा, मंत्र पुष्पांजलि आदि करें। तत्पश्चात प्रसाद वितरण कर पूजन संपन्न करें।

धार्मिक मान्‍यतानुसार मां दुर्गा के इस शैलपुत्री के रूप की उपासना (स्तुति / आराधना / पूजा) करते समय निम्‍न मंत्र का उच्‍चारण करने से मां जल्‍दी प्रसन्‍न होती हैं, तथा वांछित फल प्रदान करने में सहायता करती हैं-

वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् | वृषारूढाम् शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम् ||

माँ शैलपुत्री को गाय के घी का भोग लगाना चाहिए, इससे वह प्रसन्न होती हैं और सभी प्रकार के खतरों से हमारी रक्षा करती हैं। हो सके तो इस दिन नारंगी रंग के वस्त्र धारण करें।

Shailputri Mantra, Stuti, Dhyaan and Kavach

Shailputri is the first form amongst nine forms of maa durga or shakti.  Shailputri is daughter of Himalaya (Parvat Raj Himalaya i.e. king of mountains) and is an absolute form of Mother nature. Literal meaning of Shail-putri is daughter (putri) of mountain (shail).  First day of Navratri Puja / Upasana is dedicated to Maa Shailputri.  Shailputri has a half moon in her forehead and holds a trident in her right hand and a lotus flower in left hand. She rides on nandi (bull).

Shailputri is Devi of the root chakra, who, upon awakening, begins Her journey upwards. Sitting on Nandi and making her first journey from the first or root energy chakra of kundalini i.e “Muladhara chakra” towards seventh or last energy chakra of kundalini i.e. “Sahasrara (Crown Chakra)”. As from her father to her better half – the awakening Shakti, beginning Her search for Lord Shiva or making a move towards her Shiva. So that, In Navratri pooja the first day Yogi’s keep their mind concentrated on Muladhara Chakra. This is the starting point of their spiritual discipline. Upasak or Yogis start their Yogasadhna from here. Shailaputri is the Muladhara Shakti to be realized within Self and sought for higher depths, in the yogic meditation.

As stated earlier Shailputri means the daughter of the king of mountains, Himalaya. SHAILA is derived from the word SHILA. Shila means a rock, a stone. It is the rock of spiritual standing and the whole world gets strength from the Shailputri (Shailaputri / शैलपुत्री) aspect of “Shakti” or “Purna Prakriti MAA DURGA”.

Yogis and Saadhak or Upasak consider First Navaratri (Navratri) as a very auspicious day. This is the Yogic start for being in tune with the Divine Mother Durga. Those who want to have any kind of initiation in the Shakti Mantras, can have it on the First of Shukla Pratipada.

The aspiration of a devotee is to reach higher and further higher, for spiritual evolution, and for the attainment of Siddhi, which is perfection associated with Ananda(bliss). Verily, Shailputri (Shailaputri / शैलपुत्री) is the Muladhara Shakti to be realized within Self and sought for higher depths, in the YOGA-maditation. This is an experience in the soul-searching of Immutable within human existence. Shailputri (Shailaputri / शैलपुत्री) is the physical consciousness of the Divine Mother Durga. She is truly PARVATI, daughter of the King Hemavana, as described in the Shiva Purana. Shailputri (Shailaputri / शैलपुत्री) is the manifestation of this earth planet, which includes what is apparent on this earth, and within the globe. Shailputri (Shailaputri / शैलपुत्री) covers all the hills, vales, water resources, seas and oceans, including atmosphere.

Therefore, Shailputri (Shailaputri / शैलपुत्री) is the essence of the earthly existence. Her abode is in the Muladhara Chakra. The divine Energy is latent in every human being. It is to be realized. Its color is crimson. The Tattva(element) is Earth, with the Guna(quality) of coherence, and with the Bheda(distinct) characteristics of Ghraana(the smell).

माँ दुर्गा के ९ रूप  – maa durga ke 9 roop (nine forms of maa durga)

Akhilesh Sharma

Akhilesh Sharma is a well known digital marketeer and SEO consultant. He is also having a vast experience of architecting and programming for eCommerce applications and payment gateway integrations.

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